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Full Version: Meera : Vichar Se Parde Tak Ka Safar
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p1j
Friends,

Here is an old article on "Meera".. The english transcript is given below for those who cant read hindi on PC. (The english transcript is just a working transcript as I transcribed it originally in Hindi only and you might not find some proper wordings but I hope you'll be able to make out the context as such.. )...

enjoy..

Pavan


मीरा : विचार से पर्दे तक का सफ़र
गुलज़ार

(फ़िल्म पूरी होने से पूर्व १५ दिसम्बर १९७५ को लिखा आलेख, राधाकृष्ण पर
प्रकाशित 'मीरा' से साभार)


प्रेम जी आये एक रोज़ । सन १९७५ की बात है । साथ में बहल साहब थे - श्री
ए.के. बहल । प्रेमजी ने बताया कि वह 'मीरा' बनाना चाहते हैं ।

बस, सुन के ही भर गया ! यह ख़याल कभी क्यों नहीं आया?
उस 'प्रेम दीवानी' का ख़याल शायद सिर्फ़ प्रेम जी को ही आ सकता था ।

बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रेम जी को 'दीवान-ए-ग़ालिब' ज़ुबानी याद है ।
ऐसी याददाश्त भी किसी दूसरे की नहीं देखी । उर्दू अदब के सिर्फ़ शौक़ीन
नहीं, दीवाने हैं; और अन्ग्रेज़ी में कल तक आख़िरी किताब कौन-सी छपी है,
बता देंगे, और यह भी कि:
'मार्केट में अभी आयी नहीं । उसका 'थीम' कुछ ऐसा है...।'

किताबें ज़ुबानी याद रखने की उन्हें आदत-सी हो गयी है । ऐसे प्रोड्यूसर के
साथ काम करना वैसे ही ख़ुशक़िस्मती की बात है, और फिर 'मीरा' जैसी फ़िल्म
पर!

अगस्त १९७५ में 'मीरा' बनाने का फ़ैसला तय पा गया । १४ अक्तूबर सन १९७५ को
'मीरा' के मुहूर्त का दिन निकला । दिन दशहरे का था ।

यह ख़याल भी प्रेम जी का ही था कि मुहूर्त लताजी से करवाया जाये । आज की
'मीरा' तो वही हैं!

प्रेम जी ख़ुद बडे शर्मीले क़िस्म के इंसान हैं । बडे से बडा काम करके भी
खुद पर्दे के पीछे रहते हैं । यह ज़िम्मेदारी उन्होने मुझे सौंप दी।

लता जी मुहूर्त के लिये तो राज़ी हो गयीं, लेकिन उन्होने फ़ौरन हमारे कान
में यह बात भी डाल दी कि वह इस फ़िल्म के लिये गा नहीं सकेंगी।

मौक़ा और वक़्त ऐसा था कि बहस करना मुनासिब न समझा, सो मुहूर्त हो गया,
लेकिन लगा कि कहीं एक सुर कम रह गया है!

भूषण जी दिल्ली से मीरा पर किताबों का सूटकेस भरकर ला चुके थे, और उन्हें
पढना, उलटना-पलटना शुरू कर चुके थे। किताबें बेहिसाब थीं, और मीरा कहीं
भी नहीं! यह राम-कहानी आप भूषण जी की ज़ुबानी ही सुनियेगा । भूषणजी की
याददाश्त भी कमाल की है; उन्हें जिल्द समेत किताब चट कर जाने की आदत है।
और कहीं इतिहास की चर्चा छिड जाये तो बता देंगे - मोहन-जो-दडो में
चीटियों के बिल कहां कहां पर थे!

इतनी सारी उलझा देने वाली बातों में से , ज़ाहिर है, कोई एक रास्ता अपनाना
ज़रूरी था । छोटी-मोटी समझ-बूझ के अनुसार जो चुना वही आप फ़िल्म में
देखेंगे । लेकिन इस फ़िल्म की आप-बीती भी मीरा के संघर्ष से किसी तरह कम
नहीं ।

सन १९७६ में स्क्रिप्ट तैयार हुई और जून १९७६ से शूटिंग शुरू होनी थी ।
उम्मीद थी, आठ-दस माह में फ़िल्म की शूटिंग पूरी हो जायेगी ।

'मीरा' के 'पति' की तलाश में उतनी ही दिक्कत हुई जितनी कि हेमा को अपनी
ज़िन्दगी में... या कहिये, हेमा की मम्मी को बेटी का वर ढूंढने में हुई
हो, या हो रही हो! कोई हीरो यह रोल करने को तैयार नहीं था । किस-किस की
ड्योढी पर शगुन की थाली गयी, कहना मुश्किल है । ख़ुद कृष्ण होते तो
शायद... । आख़िरकार अमिताभ मान गये ।


१९ जून १९७६ को शूटिंग का पहला दिन था । इसीलिए मई में 'मेरे तो गिरधर
गोपाल' की रिकार्डिंग रखी गयी थी । सबसे पहले इसी गाने को फ़िल्माना थ ।
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को हम लता जी की मर्ज़ी बता चुके थे; उन्हें फिर भी
यक़ीन था कि वे लता जी को मना लेंगे।

रिकार्डिंग से कुछ दिन पहले लक्ष्मीजी ने लताजी से बात की । और उन्होने
फिर इंकार कर दिया । लक्ष्मीजी दुविधा में पड गये । मुझसे कहा कि आप ख़ुद
एक बार और लताजी से कहकर देखिये । मैंने फिर बात की लताजी से । उनके ना
गाने की वजह मुझे बहुत माक़ूल लगी । उन्होने बताया कि मीरा के दो प्राइवेट
एल.पी. वह गा चुकी हैं और जिस श्रद्धा के साथ उन्होने मीरा के भजन गाये,
उसके बाद अब वह किसी भी 'कमर्शियल' नज़रिये से मीरा के भजन नहीं गाना
चहतीं। मैंने उनका फ़ैसला लक्ष्मी-प्यारे तक पहुंचा दिया, और दरख्वास्त की
कि वह किसी और आवाज़ को चुन लें।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म छोड दी। इस फ़िल्म में म्युज़िक देने से
इंकार कर दिया।
हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। फ़िल्म का सेट लग चुका था । प्रेमजी बहुत
परेशान थे, लेकिन उनके हौसले का जवाब नहीं; बोले:

'मीरा सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है.. एक मक़सद भी है.. बनायेंगे ज़रूर!'

गीतों को फ़िलहाल छोडकर हमने १९ जून १९७६ से फ़िल्म की शूटिंग शुरू कर दी ।
फ़िल्म में विद्या सिन्हा का प्रवेश अचानक हुआ । उस छोटे से रोल के लिये
उसका राज़ी हो जाना मुझ पर एक निजी एहसान था । शायद दूसरी कोई हीरोइन उसके
लिये तैयार न होती । पहली शूटिंग हमने हेमा और विद्या के साथ की, और गौरी
के साथ - जिसने ललिता का रोल किया है ।

दो दिन में यह सेट ख़त्म हो गया।

एक बार फ़िर 'वर' की तलाश शुरू हुई ।
'मीरा' के लिये म्युज़िक डायरेक्टर भी चाहिये था ।

'पंचम', यानी आर.डी. बर्मन, मेरे दोस्त हैं । उनसे पूछा, वह भी तैयार न
हुए। लता जी से ना गवा कर वह किसी वाद-विवाद या कंट्रोवर्सी में नहीं
पडना चाहते थे।

इस नुक़्ते को लेकर किसी तरह के वाद-विवाद की बात मेरी समझ में भी नहीं
आती थी । अब सभी तो दिलीप कुमार को लेकर फ़िल्में तो नहीं बनाते! और अगर
दिलीप साब किसी फ़िल्म में काम ना करें तो... क्या प्रोड्यूसर फ़िल्में
बनाना छोड दें, या डायरेक्टर डायरेक्शन से हाथ खींच ले? मुझे लगा - उन
सब के 'कैरियर' सिर्फ़ एक आवाज़ के मोहताज हैं । उस आवाज़ के सहारे के बग़ैर
कोई एक क़दम भी नहीं चल सकता । बहरहाल यह मसला म्युज़िक डायरेक्टर का था ।
कुछ हफ़्ते तो ऐसी परेशानी में गुज़रे कि लगता था, यह फ़िल्म ही ठप हो
जायेगी । तभी फ़िल्म के आर्ट डायरेक्टर देश मुखर्जी ने एक दिन एक नाम
सुझाया । और वह नाम फ़ौरन दिल-दिमाग़ में जड पकड गया - पंडित रविशंकर !

पंडितजी बहुत दिनों से अमरीका में रहते थे । हिन्दुस्तानी फ़िल्मों में
म्युज़िक देना तो वह कब का छोड चुके थे!

पता-ठिकाना मालूम करना भी दूर की बात लगी, और फिर अगर वो मान भी जायें तो
इतने गाने कब और कैसे रिकार्ड होंगे ? हर गाने कि रिकार्डिंग के लिये तो
उन्हें अमरीका से बुलवाया नहीं जा सकता । फिर भी, एक चिराग़ जला तो
सही... चाहे बहुत दूर ही सही ।

पांच-सात दिन की कोशिशों के बाद हम दोनों के दोस्त हितेन चौधरी ने
पंडितजी का फ़ोन नम्बर लाकर दिया, और बतलाया कि फ़लां तारीख़ को वह तीन दिन
के लिये इस नम्बर पे लंदन आकर ठहरेंगे । चाहें तो उनसे बात कर लीजिये ।
चौधरी साहब से हमने अनुरोध किया 'आप परिचय करवा दीजिये, हम बात कर लेंगे'


पंडित जी लंदन में थे । मैंने बात की ।

आवाज़ अगर शख्सियत से ढंके पर्दों को खोल कर कोई भेद बता सकती है, तो मैं
कह सकता हूं - बातचीत के इस पहले मौक़े पर्ही मुझे उम्मीद हो गयी थी कि
पंडित जी मान जायेंगे । इतनी बडी हस्ती होते हुए भी उनकी आवाज़ में बला की
नम्रता थी । उनकी शर्त बहुत सादा और साफ़ थी - ' मुझे फ़िल्म की स्क्रिप्ट
सुना दीजिये । अच्छी लगी तो ज़रूर संगीत दूंगा'

अगले दिन ही पंडित जी न्यूयार्क जा रहे थे । प्रेमजी ने फ़ौरन फ़ैसला कर
लिया : 'आप न्यूयार्क जाइये और हितेन दा को साथ ले जाइये । आप जो मुनासिब
समझें, वह फ़ैसला कर आइये ।'

हितेन-दा पुराने दोस्त हैं, मान गये । ३१ जुलाई १९७६ को मैं न्यूयार्क
में था । लेकिन पंडित जी न्यूयार्क में नहीं थे।

३ अगस्त को पंडित जी न्यूयार्क लौट आये । उसी शाम उनसे मुलाक़ात हुई ।
मुलाक़ात के आधे घंटे बाद ही मैंने स्क्रिप्ट सुनानी शुरू कर दी । पूरे दो
घंटे चालीस मिनट लगे मुझे स्क्रिप्ट सुनाने में । उसके तीन मिनट बाद ही
'मीरा' को म्युज़िक डायरेक्टर मिल गया !

बाकी सारी बातें हितेन-दा ने तय करा दीं ।

लताजी से जो बात हुई थी मैंने पंडित जी को बतला दी । उन्हें भी अफ़सोस
ज़रूर हुआ कि लता जी गातीं तो अच्छा होता ।

लता जी उन दिनों वाशिंगटन में थीं । दो दिन बाद मेरा वाशिंगटन जाना हुआ
तो मैंने लताजी से बात की और यह बता दिया कि पंडितजी 'मीरा' के लिये
संगीत दे रहे हैं

वहीं - 'वाटरगेट होटल' में मुकेश जी से ज़िन्दगी की आख़िरी मुलाक़ात हुई ।
शायद नसीब में ऐसा होना लिखा था । रविशंकर जी के चुनाव पर उन्होने मुझे
मुबारकबाद भी दी थी । वहीं, उसी दौरे में मुकेशजी का देहांत हो गया।

न्यूयार्क में एक दिन निहायत ख़ूबसूरत आवाज़ का फ़ोन आया :

'मैं फ़िल्मों में काम करना चाहती हूं, लेकिन आप किसी को बताइयेगा नहीं !'

'अरे' मैंने हैरत से कहा, 'आप फ़िल्मों में काम करेंगी तो छुपायेंगी कैसे?"

'छुपाने को थोडे ही कहती हूं, आप बताइयेगा नहीं ! लोग अपने आप देख लेंगे!'

वह दीप्ती थी - दीप्ती नवल ! किसी न किसी रोज़, एक ना एक फ़िल्म में आप उसे
ज़रूर देखेंगे !

सोलह अगस्त तक मैं पंडित जी के साथ था । उनके बेहद व्यस्त प्रोग्राम में,
जहां जहां वक़्त मिला, वह मीरा के भजनों पर काम करते रहे, स्क्रिप्ट पर
अपने नोट विस्तार से लेते रहे । सोलह अगस्त को जब पंडित जी के साथ आख़िरी
बैठक हुई तो उस दिन तक बम्बई में हमारी रिकार्डिंग की तमाम तारीख़ें और
स्टुडियो बुक हो चुके थे । और सब से अहम बात जो तय हो चुकी थी, वह यह कि
मीरा के गाने गायेंगी - वाणी जयराम

नवम्बर के शुरू में पंडित रविशंकर हिन्दुस्तान पहुंचे । २२ नवम्बर १९७६
से गानों की रिहर्सल शुरू हुई । ३० नवम्बर से महबूब स्टुडियो में वसंत
मुदलियार कि देख रेख में 'मीरा' के गानों की रिकार्डिंग शुरू हुई और १५
दिसम्बर १९७६ तक 'मीरा' का पूरा म्युज़िक रिकार्ड हो चुका था! एक व्यक्ति,
जिसने अनथक मेहनत की इस काम को पूरा करने में वह थे श्री विजय राघव राव,
जो पंडित जी का दाहिना हाथ ही नहीं, दोनों हाथ हैं ।

मीरा का संगीत पूरा हुआ, शूटिंग की तैयारी शुरू हुई और...
अमिताभ बच्चन ने फ़िल्म छोड दी ।

'वर की तलाश फ़िर से शुरू हो गयी।
फ़िल्म फिर रुक गयी ।

इस बार कई महीने लग गये। किसी नये कलाकार को भी लिया जा सकता था, मगर एक
बडी मुश्किल थी कि उन्हीं दिनों 'मीरा' की ज़िन्दगी पर एक और फ़िल्म रिलीज़
हुई और फ़्लाप हो गयी । इंडस्ट्री में - मीरा की कहानी पर एक अभिशाप है -
कहा जाने लगा । नये अभिनेता को लेकर प्रेमजी के लिये फ़िल्म बेचना ज़्यादा
मुश्किल हो जाता । डिस्ट्रीब्यूटर्स की दिलचस्पी यूं ही टूट रही थी ।
उनका ख़याल था, प्रेम जी अब यह फ़िल्म पूरी नहीं कर पायेंगे । लेकिन एक बार
फिर उनके हौसले की दाद देनी पडती है । चुपचाप वह अपने इंतजाम में लगे रहे
। मुझसे कहा : 'आप शूटिंग शुरू कीजिये । 'मीरा' ख़ुद ही कोई रास्ता
बतायेगी । अगर वह अपनी लगन से नहीं हटी, तो हन क्यों हट जायें ?'

२५ मई १९७७ से इस फ़िल्म की बक़ायदा शूटिंग शुरू हुई ।

राजा भोज के द्रुश्यों को छोडकर - जो भी शूटिंग मुमकिन थी - वह चलती रही
। और फिर एक दिन अचानक ही राजा भोज मिल गये ।

विनोद खन्ना राजा भोज का रोल करने के लिये तैयार हो गये ।
वह महीना जनवरी का था, सन १९७८ ।

विनोद बस एक दिन के लिये सेट पर आये थे । बाक़ी तारीख़ें सितम्बर १९७८ से
शुरू होती थीं और इस हिसाब से नवम्बर तक फ़िल्म पूरी हो जाती थी।

अगस्त १९७८ में विनोद खन्ना ने फ़िल्म-लाइन त्याग देने का फ़ैसला कर लिया ।

जनवरी के उस एक दिन की बंदिश के लिये विनोद ने 'मीरा' पूरी करने की हामी
भर ली थी । 'मीरा' समझिये कि बाल बाल बच गयी, वर्ना फिर वही तलाश शुरू हो
जाती ! सितम्बर में विनोद ने शूटिंग शुरू की और इधर पंडित जी का तार भी
मिला ।

मुझे ये बताने की मोहलत नहीं मिली कि सन १९७६ में जब फ़िल्म का संगीत
रिकार्ड किया गया था तो हमने सितम्बर १९७७ की तारीख़ें फ़िल्म के
बैकग्राउंड म्युज़िक के लिये तय कर ली थीं । अब सन १९७८ आ चुका था और
पंडितजी पूछ रहे थे कि फ़िल्म का बैक-ग्राउन्ड म्युज़िच रिकार्ड होना कब
शुरू होगा? क्योंकि इस साल सितम्बर में अगर बैक-ग्राउंड म्युज़िक न
रिकार्ड हो पाया, तो पंडित जी अप्रैल १९७९ तक हिन्दुस्तान नहीं आ पायेंगे


प्रेम जी मुस्करा दिये । एक शेर पढा :

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमां
हो रहेगा कुछ-ना-कुछ घबरायें क्या !

बडा प्यार आया प्रेमजी पर ।

१५ सितम्बर से २० सितम्बर १९७८ तक के बीच फ़िल्म का बैक-ग्राउंड म्युज़िक
भी रिकार्ड कर लिया गया।

फ़िल्म का पूरा होना अभी काफ़ी दूर था । लेकिन पूरी फ़िल्म के हर सीन की
अन्दाजन लम्बाई निकाल कर , बगैर फ़िल्म देखे , सिर्फ़ स्क्रिप्ट के भरोसे
पर, हमने 'मीरा' का बैक-ग्राउंड म्युज़िक पूरा कर लिया ।

अक्तूबर से फिर शूटिंग शुरू कर ली । अब बैक-ग्राउंड म्युज़िक पहले था और
'सीन' बाद में ।

नवम्बर में फ़िल्म ख़त्म हो रही थी जब बम्बई में पीलिया की बीमारी फैली ।
इंडस्ट्री के बहुत से कलाकार उसकी लपेट में आ गये ।

पहली बार... हेमा की वजह से तारीख़ें कैंसिल हो गयीं । बेचारी बीमारी की
गिरफ़्त में आ गयी ।

विनोद की तारीख़ों का मसला फिर वैसे ही सामने खडा है ।

हमारे एक 'मियां मुश्किल-कुशा' हैं - श्री तरन तारन । वही ऐसी मुश्किलें
सुलझाते रहे हैं । यह मुश्किल भी उनके सामने रख दी है ।

यह दिसम्बर चल रहा है, आज की ताज़ा ख़बर के अनुसार ३० दिसम्बर को फ़िल्म
ख़त्म कर पाऊंगा ।

अंग्रेज़ी में कहते हैं ना : 'टच-वुड'

१५ दिसम्बर, १९७८
गुलज़ार


meeraa : vichar se parde tak ka safar
gulzar

(Written on 15th December, just before completing the film)


Prem ji aaye ek roz. san 1975 kee baat hai. saath mein bahal saahab the - shree a.k. bahal. Prem ji ne batayaa kee vah 'meeraa' banaanaa chahte hain .

bas, sun ke hee bhar gayaa ! yah khayaal kabhee kyon naheen aayaa?
us 'prem deewaanee' ka khayaal shaayad sirf Prem ji ko hee aa sakataa tha .
bahut kam log jaanate hain kee Prem ji ko 'deewaan-e-ghalib' zubaani yaad hai . aisi yaadadaasht bhee kisi doosare kee naheen dekhee . urdu adab ke sirf shaukeen naheen, deewaane hain; aur angrezi mein kal tak akhiri kitaab kaun-see chhapi hai, bataa denge, aur yah bhee ki:
'markeT mein abhee aayee naheen . usaka 'theme' kuchh aisa hai....'

kitaabein zubaani yaad rakhane kee unhein aadat-see ho gayee hai . aise producer ke saath kaam karna vaise hee khushakismati kee baat hai, aur phir 'meeraa' jaisi film par!

august 1975 mein 'meeraa' banaane ka faisalaa tay paa gayaa . 14 october san 1975 ko 'meeraa' ke muhurt ka din nikalaa . din dashahare ka tha .

yah khayaal bhee Prem ji ka hi tha ki muhUrt Lataji se karawaayaa jaaye . aaj kee 'meeraa' to wahee hain!

Prem ji khud baDe sharmeele kism ke insaan hain . baDe se baDaa kaam karake bhee khud parde ke peeChhe rahate hain . yah zimmedari unhone mujhe saunp dee.

Lata ji muhUrt ke liye to raazee ho gayeen, lekin unhone fauran hamaare kaan mein yah baat bhee Daal dee kee vah is film ke liye gaa naheen sakengee.

maukaa aur vakt aisaa tha ki bahas karanaa munaasib na samajhaa, so muhurt ho gaya, lekin lagaa ki kaheen ek sur kam rah gaya hai!

bhushaN ji dilli se meeraa par kitaabon ka suitcase bharakar laa chuke the, aur unhein paDhanaa, uLatanaa-paLatanaa shuroo kar chuke the. kitaaben be-hisaab theeN, aur meeraa kaheen bhee naheen!

yah raam-kahaani aap bhooShaN ji kee zubaanee hee suniyegaa . bhooShaNaji kee yaadadaasht bhee kamaal kee hai; unhein zild samet kitaab chaT kar jaane kee aadat hai. aur kaheen itihaas kee charchaa ChhiD jaaye to bataa denge - mohan-jo-daDo mein cheeTiyon ke bil kahaan kahaan par the!

itani saaree ulajhaa dene waalee baaton mein se , zaahir hai, koI ek raastaa apananaa zarooree tha. ChoTee-moTee samajh-boojh ke anusaar jo chuna wahee aap film mein dekhenge. lekin is film kee aap-beetee bhee meeraa ke sangharSh se kisi tarah kam naheen.

san 1976 mein script taiyaar huee aur june 1976 se shooting shuroo honee thee. ummeed thee, aaTh-das maah mein film kee shooting poori ho jaayegee.

'meeraa' ke 'pati' kee talaash mein utani hee dikkat huI jitani kee hema ko apanee zindagi mein, yaa kahiye, hema kee mummy ko beTi ka 'var' DhoonDhane mein huI ho, yaa ho rahi ho! koI heero yah role karane ko taiyaar naheen tha. kis-kis kee DyoDee par shagun kee thaali gayee, kahnaa mushkil hai. khud kRiShN hote to shaayad... .

akhirkar Amitabh maan gaye.


19 june 1976 ko shooting ka pahla din tha . isiliye 'MAY' mein 'mere to giradhar gopaal' kee recording rakhee gayee thee . sabase pahale isee gaane ko filmana tha . Lakshmikant Pyaarelaal ko ham Lata ji kee marzi bataa chuke the; unhein phir bhee yakeen tha ki ve Lata ji ko manaa lenge.

Recording se kuchh din pahle lakshmikantji ne Lataji se baat kee aur unhone phir inkaar kar diyaa . lakshmiji duvidhaa mein paD gaye . mujhse kaha ki aap khud ek baar aur Lataji se kahkar dekhiye . maine phir baat kee Lataji se. unke naa gaane kee wajah mujhe bahut maakool lagee. unhone bataayaa kee meeraa ke do private LP. vah gaa chukee hain aur jis shraddhaa ke saath unhone meeraa ke bhajan gaaye, usake baad ab vah kisee bhee 'kamarshiyal' nazariye se meeraa ke bhajan naheen gaanaa chahateen. maine unakaa faisalaa lakShmee-pyaare tak pahunchaa diyaa, aur darakhvaast kee ki vah kisee aur aavaaz ko chun len.

Lakshmikant pyaarelaal ne film ChoD dee. is film mein music dene se inkaar kar diyaa.
hamaare paas koI raastaa naheen thaa. film ka seT lag chukaa tha . Prem ji bahut pareshaan the, lekin unake hausale ka javaab naheen; bole:

'meeraa sirf ek film naheen hai.. ek makasad bhee hai.. banaayenge zaroor!'

geeton ko filahaal ChhoDkar hamane 19 joon 1976 se film kee shooting shuroo kar dee . film mein Vidya Sinhaa ka pravesh achaanak huaa . us chhoTe se rol e ke liye usakaa raazee ho jaanaa mujh par ek niji ehasaan tha . shaayad doosaree koI heeroin usake liye taiyaar na hotee . pahli shooting hamane hema aur vidya ke saath kee, aur gauree ke saath - jisane lalita ka rol kiyaa hai .

do din mein yah seT khatm ho gayaa.

ek baar fir 'var' kee talaash shuroo huI .

'meeraa' ke liye music Director bhee chaahiye tha .

'pancham', yaanee aar.Dee. barman, mere dost hain . unase pooChaa, vah bhee taiyaar na hue. Lata ji se naa gavaa kar vah kisee vaad-vivaad yaa controversy mein naheen paDanaa chaahte the.

is nukte ko lekar kisee tarah ke vaad-vivaad kee baat meree samajh mein bhee naheen aatee thee . ab sabhee to dilip kumaar ko lekar filmein to naheen banaate! aur agar dilip saab kisee film mein kaam naa karein to... kyaa producer filmen banaanaa ChoD den, yaa Director Daayarekshan se haath kheench le? mujhe lagaa - un sab ke 'kairiyar' sirf ek aavaaz ke mohataaj hain . us aavaaz ke sahaare ke bagair koI ek kadam bhee naheen chal sakataa . baharahaal yah masalaa music Director ka tha . kuchh hafte to aisee pareshaanee mein guzare kee lagataa thaa, yah film hee Thap ho jaayegee . tabhee film ke aarT Director desh mukharji ne ek din ek naam sujhaayaa . aur vah naam fauran dil-dimaag mein jaD pakaD gayaa - pandit ravishankar !

panditaji bahut dinon se amareekaa mein rahate the . hindustaanee filmon mein music denaa to vah kab ka ChoD chuke the!

pataa-Thikaanaa maaloom karanaa bhee door kee baat lagee, aur phir agar wo maan bhee jaayen to itane gaane kab aur kaise record honge ? har gaane kee recording ke liye to unhein amareekaa se bulawaayaa naheen jaa sakataa . phir bhee, ek chiraag jalaa to sahee... chaahe bahut door hee sahee .

paanch-saat din kee koshishon ke baad ham donon ke dost hiten chaudharee ne panditaji ka fon nambar laakar diyaa, aur batalaayaa kee falaan taareekh ko vah teen din ke liye is nambar pe landan aakar Thaharenge . chaahen to unase baat kar leejiye . chaudharee saahab se hamane anurodh kiyaa 'aap parichay karavaa deejiye, ham baat kar lenge' .

pandit ji london mein the . maine baat kee .

aavaaz agar shakhsiyat se Dhanke pardon ko khol kar koI bhed bataa sakatee hai, to main kah sakataa hoon - baatacheet ke is pahale mauke parhee mujhe ummeed ho gayee thee kee pandit ji maan jaayenge . itanee baDee hastee hote hue bhee unakee aavaaz mein balaa kee namrataa thee . unakee shart bahut saadaa aur saaf thee - ' mujhe film kee script sunaa deejiye . achChee lagee to zaroor sangeet doongaa'

agale din hee pandit ji newyork jaa rahe the . Prem ji ne fauran faisalaa kar liyaa : 'aap newyork jaaiye aur hiten daa ko saath le jaaiye . aap jo munaasib samajhen, vah faisalaa kar aaiye .'

hiten-daa puraane dost hain, maan gaye . 31 julaaI 1976 ko main newyork mein tha . lekin pandit ji newyork mein naheen the.

3 august ko pandit ji newyork lauT aaye . usee shaam unase mulaakaat huee . mulaakaat ke aadhe ghanTe baad hee maine script sunaanee shuroo kar dee . poore do ghanTe chaalees minaT lage mujhe script sunaane mein . usake teen minaT baad hee 'meeraa' ko music Director mil gayaa !

baakee saaree baaten hiten-daa ne tay karaa deen .

Lataji se jo baat huI thee maine pandit ji ko batalaa dee . unhein bhee afasos zaroor huaa kee Lata ji gaateen to achChaa hotaa .

Lata ji un dinon Washington mein thee . do din baad meraa Washington jaanaa huaa to maine Lataji se baat kee aur yah bataa diyaa kee panditaji 'meeraa' ke liye sangeet de rahe hain

vaheen - 'WaTergaTe hoTal' mein mukesh ji se zindagee kee aakhiree mulaakaat huI . shaayad naseeb mein aisaa honaa likhaa tha . ravishankar ji ke chunaav par unhone mujhe mubaarakabaad bhee dee thee . vaheen, usee daure mein mukeshaji ka dehaant ho gayaa.

newyork mein ek din nihaayat khoobasoorat aavaaz ka fon aayaa :

'main filmon mein kaam karanaa chaahtee hoon, lekin aap kisee ko bataaiyegaa naheen !'

'are' maine hairat se kahaa, 'aap filmon mein kaam karengee to Chupaayengee kaise?"

'Chupaane ko thoDe hee kahatee hoon, aap bataaiyegaa naheen ! log apane aap dekh lenge!'

vah deeptee thee - deeptee naval ! kisee na kisee roz, ek naa ek film mein aap use zaroor dekhenge !

solah august tak main pandit ji ke saath tha . unake behad vyast prograam mein , jahaan jahaan vakt milaa, vah meeraa ke bhajanon par kaam karate rahe, script par apane noT vistaar se lete rahe . solah august ko jab pandit ji ke saath aakhiree baiThak huI to us din tak bambaI mein hamaaree recording kee tamaam taareekhen aur sTuDiyo buk ho chuke the . aur sab se aham baat jo tay ho chukee thee, vah yah kee meeraa ke gaane gaayengee - vaaNee jayaraam

navambar ke shuroo mein pandit ravishankar hindustaan pahunche . 22 navambar 1976 se gaanon kee riharsal shuroo huee . 30 navambar se mahaboob sTuDiyo mein vasant mudaliyaar kee dekh rekh mein 'meeraa' ke gaanon kee recording shuroo huee aur 15 disambar 1976 tak 'meeraa' ka pooraa music record ho chukaa thaa! ek vyakti, jisane anathak mehanat kee is kaam ko pooraa karane mein vah the shree vijay raaghav raav, jo pandit ji ka daahinaa haath hee naheen, donon haath hain .

meeraa ka sangeet pooraa huaa, shooting kee taiyaaree shuroo huee aur...
amitaabh bachchan ne film ChoD dee .

'var kee talaash fir se shuroo ho gayee.
film phir ruk gayee .

is baar kaI maheene lag gaye. kisee naye kalaakaar ko bhee liyaa jaa sakataa thaa, magar ek baDee mushkil thee kee unheen dinon 'meeraa' kee zindagee par ek aur film rileez huI aur flaap ho gayee . inDasTree mein - meeraa kee kahaanee par ek abhishaap hai - kahaa jaane lagaa . naye abhinetaa ko lekar Prem ji ke liye film bechanaa zyaadaa mushkil ho jaataa . ditributors kee dilachaspee yoon hee TooT rahee thee . unakaa khayaal thaa, Prem ji ab yah film pooree naheen kar paayenge . lekin ek baar phir unake hausale kee daad denee paDatee hai . chupachaap vah apane intajaam mein lage rahe . mujhase kahaa : 'aap shooting shuroo keejiye . 'meeraa' khud hee koI raastaa bataayegee . agar vah apanee lagan se naheen haTee, to han kyon haT jaayen ?'

25 maI 1977 se is film kee bakaayadaa shooting shuroo huI .

raajaa bhoj ke drishyon ko ChoDakar - jo bhee shooting mumakin thee - vah chalatee rahee . aur phir ek din achaanak hee raajaa bhoj mil gaye .

vinod khannaa raajaa bhoj ka rol karane ke liye taiyaar ho gaye .
vah maheenaa janavaree ka thaa, san 1978 .

vinod bas ek din ke liye seT par aaye the . baakee taareekhen sitambar 1978 se shuroo hotee theen aur is hisaab se navambar tak film pooree ho jaatee thee.

august 1978 mein vinod khannaa ne film-laain tyaag dene ka faisalaa kar liyaa .

janavaree ke us ek din kee bandish ke liye vinod ne 'meeraa' pooree karane kee haamee bhar lee thee . 'meeraa' samajhiye kee baal baal bach gayee, varnaa phir vahee talaash shuroo ho jaatee ! sitambar mein vinod ne shooting shuroo kee aur idhar pandit ji ka taar bhee milaa .

mujhe ye bataane kee mohalat naheen milee kee san 1976 mein jab film ka sangeet record kiyaa gayaa tha to hamane sitambar 1977 kee taareekhen film ke background music ke liye tay kar lee theen . ab san 1978 aa chukaa tha aur panditaji pooCh rahe the kee film ka background music record honaa kab shuroo hogaa? kyonki is saal sitambar mein agar background music na record ho paayaa, to pandit ji aprail 1979 tak hindustaan naheen aa paayenge .

Prem ji muskaraa diye . ek sher paDhaa :

raat din gardish mein hain saat aasamaan
ho rahegaa kuchh-naa-kuchh ghabaraayen kyaa !

baDaa pyaar aayaa Prem ji par .

15 sitambar se 20 sitambar 1978 tak ke beech film ka background music bhee record kar liyaa gayaa.

film ka pooraa honaa abhee kaafee door tha . lekin pooree film ke har seen kee andaajan lambaaI nikaal kar , bagair film dekhe , sirf script ke bharose par, hamane 'meeraa' ka background music pooraa kar liyaa .

aktoobar se phir shooting shuroo kar lee . ab background music pahale tha aur 'seen' baad mein .

navambar mein film khatm ho rahee thee jab bambaI mein peeliyaa kee beemaaree phailee .
inDustry ke bahut se kalaakaar usakee lapeT mein aa gaye .

pahalee baar... hemaa kee vajah se taareekhen cancel ho gayeen . bechaaree beemaaree kee giraft mein aa gayee .

vinod kee taareekhon ka masalaa phir vaise hee saamane khaDaa hai .

hamaare ek 'miyaan mushkil-kushaa' hain - shree taran taaran . vahee aisee mushkilen sulajhaate rahe hain . yah mushkil bhee unake saamane rakh dee hai .

yah disambar chal rahaa hai, aaj kee taazaa khabar ke anusaar 30 disambar ko film khatm kar paaUngaa .

angrezee mein kahate hain naa : 'Touch-wood'

15 disambar, 1978
gulzar


Raj Nandini
MEERA BY GULZAR:


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RAJ NANDINI
Erum Hashmi
Thanks for the image, Raj!
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